(आज का जेनरेशन ज़ेड आंदोलन संदर्भ: भूख कविता-२)

—देवेंद्र किशोर ढुङगाना

गाँव में चोर नेता आया है,

ऊपर झंडा, अंदर धंदा, मुँह में राम राम ,

बगली में छुरा,

दिमाग में ताला —

सत्ता ही न्यारा।

भूख चूल्हा बुझा रही है,

लेकिन वह सिंह दरबार के चूल्हे में चावल पका रहा है।

 

गाँव का पेड़ मर गया है —

पेड़ नहीं,

विश्वास टूट गया है,

आसमान में धुआँ उठ गया है —

यह आग नहीं,

यह विद्रोह है।

लेकिन नेता कहता है —

“शांत रहो,

हमारी बारी आ रही है”,

लेकिन जनता की बारी कभी नहीं आती,

जैसे चाँद कभी धरती को नहीं छूता।

इस देश में, आंदोलन

किताबों के शीर्षक बन जाते हैं,

भूख कविताओं की पंक्तियाँ बन जाती हैं,

और नेता?

नेता हमेशा से

चोरों का पर्याय

बन गए हैं। जेनरेशन ज़ेड के एक हाथ में मोबाइल और

दूसरे में मुट्ठी है।

वे ट्वीट करते हैं— “हमारे पेट भूखे हैं”, फ़ेसबुक पर

लिखते हैं—

“देश जल रहा है”, और सड़कों पर चिल्लाते हैं, “तुम्हारे नाटक

अब नहीं चलेंगे, पुरानी किताबें

नहीं जलेंगी!”

एक चोर नेता

गाँव में आता है

और अपने

भाषण में लोगों के स्वर्ग की कहानी सुनाता है,

लेकिन लोगों के

घरों में स्वर्ग नहीं, बल्कि भूख और कर्ज़ का नर्क है। उसका भाषण

क्रांति लाता है, लेकिन

उसका बैंक खाता भ्रष्टाचार से भरा है। माँ कहती है— “बेटा, पढ़ाई करके क्या करोगे?”

बेटा कहता है—

“मैं नेता बनूँगा—ताकि वह कभी भूख से न मरे।” यह वाक्य गाँव में बिजली के झटके जैसा झटका देता है, लेकिन

नेता हँसता है

और कहता है,

“तुम योग्य हो, हमारी

पार्टी में आओ।” भूख हड़ताल

शुरू हुई—

पहला नारा

: “चावल नहीं तो न्याय दो।”

दूसरा नारा

:

“न्याय नहीं तो

सिंह दरबार क

घेर लो।”

तीसरा नारा

:“अब चोर नेता की सरकार नहीं,

बल्कि जनता की सरकार।”

युवा सड़कों पर उतर आए,

जिनके हाथों में किताब थी,

अब पत्थर है,

जिनके होठों पर गीत था,

अब नारा है,

और जिनकी आँखों में सपना था,

अब प्रतिरोध की ज्वाला है।

चोर नेता

गाँव में आया

लेकिन इस बार

गाँव चुप नहीं है,

वे समझ गए हैं

कि

लोकतंत्र नाम के जाल में फँसी मछली

सिर्फ़ जनता है,

और काँटा नेता के गिद्ध के मुँह में है।

अब गाँव में

आवाज़ गूँजती है

 

“हम डरते नहीं,

हम बिकते नहीं,

हम अब सत्ता के पात्र नहीं!”

एक बूढ़े किसान के होठों से

आग बरसती है, एक माँ के आँसू विद्रोह की

नदी बन जाते हैं, और

एक बच्चे के पेट की भूख बंदूक की गोली से भी तेज़ नारा बन जाती है। शहर के पत्रकार लिख रहे हैं –

“ये जनता की ज्यादती है,

ये हिंसा है,”

लेकिन

वो भूल जाते हैं – भूख भी हिंसा का ही एक रूप है,

जब चावल न हो, तो भाषणों का स्वाद पेट नहीं भरता। जेनरेशन ज़ेड की क्रांति इंटरनेट से सड़कों पर

उतर आई है,

ये सिर्फ़ माइक्रोफ़ोन की आवाज़ नहीं

पीढ़ी की

आत्मा की दहाड़ है। नेता अभी भी दिखावा करने में लगे हैं –

कहते हैं

“हम बदलाव लाएँगे”,

लेकिन बदलाव अब उनके हाथों में नहीं, उनकी मुट्ठियों में है – जो अब “चोर!” कहते हैं और हिचकिचाते नहीं। गाँव में एक चोर नेता आ गया है, लेकिन अब गाँव में कोई डर नहीं है। छत पर युवाओं का झंडा लहरा रहा है, वो किसी

पार्टी का नहीं – जनता का झंडा है। भूख का संविधान गाँव के चौराहे पर,

कलम और खून की स्याही से

लिखा जा रहा है।

अब क्रांति कोई चुनावी नारा नहीं है,

वो ज़बान पर नहीं लिखी जाती –

वो ज़बान के खून से लिखी जाती है।

अब वोट नहीं,

प्रतिरोध की माँग है,

अब पद नहीं,

समानता की

माँग है,

अब इसे

“नेता” नहीं,

बल्की “योद्धा”

कहा जाता है।

गाँव में एक चोर नेता आया,

लेकिन इस बार

उसे माला नहीं,

पत्थर मिला।

युवकों के धक्के से उसका भाषण

रुक गया,

“भूख देश की दुश्मन है,

और जो नेता इसे नहीं देखता,

वह भी देश का दुश्मन है।”

और जब सूरज डूबता है—

गाँव की दीवार पर लिखा होता है,

काले कोयले और

लाल खून से—

“अब हमारा देश बिकाऊ नहीं है,

अब हमारा पेट चुप नहीं है,

अब हम जनता के नाम पर चोर नहीं हैं,

जनता जनता के नाम पर उठ खड़ी हुई है।”

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