कविता :“एक मुठ्ठी भोक”
✍देशबन्धु क्षेत्री, भद्रपुर, झापा
ए शहरत
एक मुठ्ठी खाइबर लाइ
जत मानुस मरि रहल छै—
ओइ सब
शहीद बनि रहल छै,
भोक ले नय,
व्यवस्था ओकरे मारि रहल छै।
ओइ सब
बार–बार
मरि रहल छै।
गल्ली सब चिच्याइ रहल छै,
ढुंगा सब करुणा करि रहल छै,
राति के अन्हार मा
आँसु आर रगत मिसि के
नदि जइसन बहि रहल छै—
जत सपना
डुबि रहल छै,
आर आशा किनारा मा दबि गेल छै।
ए शहरत
नेता के भाषण त गज्जब छै,
लेकिन पेट के आवाज ओसों बेसी छै—
ओइ आवाज दबाबर
सत्ता के जुत्ता चलै छै,
आर साँच के कागज मा
घसि के फालि देल जाइ छै।
भ्रष्टाचार के महल उँचाई पर छै,
जत सुन के थार मा
झुट परोसाल जाइ छै,
आर जनता के पसिना
कर के नाम पर लुटायल जाइ छै।
ओइ नेता सब,
जकर हाथत देश के नक्शा छै,
ओकर जेबत
देश के आत्मा बेचायल छै।
विदेशी इसारा मा नाचै वाला कठपुतली सब,
देश के मान–सम्मान के
बजारत राखि के
बोलि खोलि रहल छै—
जत बोली लगाबै वाला
हमर मालिक बनै चाहै छै।
ए गाम–बस्ती ले
युवा सब बाहिर भागि रहल छै—
अपन आकाश छोड़ि के
पराइ बादर तल हराइ रहल छै।
काहे कि एतय
ओकर सपना सस्तो छै,
आर मेहनत के दाम
अपमान से तल गिरि गेल छै।
एकटा टिकट,
एकटा झोला,
आर हजारों अधूरा कहानी—
ओकरे संग
देश के भविष्य उड़ि रहल छै,
आर खाली होइ रहल छै
हमर माटी के कोख।
लेकिन एखनहुँ—
ए शहर मरे नय छै।
ए शहर–बस्ती
विद्रोह के गर्भ छै।
हरेक आँखि मा
चेतना के आगि बलि रहल छै,
हरेक मुट्ठी मा
क्रान्ति के बीज
रोपाइ के तयारी छै।
अब समय आ गेल छै—
भोक के नारा बनाबै के,
आँसु के आगि बनाबै के,
आर डर के
ढुंगा जइसन
कठोर बनाबै के।
देशभक्त सब,
उठऽ—
एकजुट होवऽ,
अइसन देश बनावऽ
जेकरा के केहू किनबेच नय करि सकय।
विदेशी हस्तक्षेप के
हात काटै के परत,
आर कठपुतली नेता सब के
जनता के अदालत मा
खड़ा करै के परत।
ए माटी
हमर छै—
एकर रक्षा
हमर कर्तव्य छै।
हम न उठली
इतिहास धिक्कारत,
आर भविष्य
हमरा माफ नय करत।
एक मुठ्ठी भोक के खिलाफ
एक मुठ्ठी विद्रोह उठो,
एक मुठ्ठी आँसु के खिलाफ
एक मुठ्ठी आगि बलो।
ए शहरत
अब केहू न मरय—
अब केहू शहीद न होय—
जदि हम
उठि गेली त।
आवऽ,
मुट्ठी कसाय,
आवाज उठावऽ,
आर ए अन्हार के
एके बेर चिरि के फालि दियऽ।
काहे कि
जनता के शक्ति
सबसे बड़ सत्य छै
आर जखन जनता जागै छै,
ओ दिन
कोनो अन्याय
बाँचि नय सकै छै।

















