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कविता
हल्दिबारी संवाददाता ११ महिना अगाडि

विसंगती कविता : समय आर परिस्थिति

बिरासतत् छे पुर्खार माटीखान,
बिनासतत् छे इतिहासेर धाँर।
सगोलत् निरहबे आर दादा–भाईला,
तुई–मुईते हेतिके चल्बे संसार।।

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जाहारे टेँक्ना उहाँरे चल्बे बुद्धि,
टाँका–पैसाते चल्बे गो व्यवहार।
“तुम से बडा, हम है” कहबे,
फेरबदल हते रहबे संसार।।

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घरसे भेराबे घरेर जिँहापुताला,
जागा–जमीन रहिते हबे बेरोजगार।
पान्जीते बठबे बिदेशीयार पासपोर्टला,
ढेराते घुर्ते रहबे बुर्हालार संसार।।

टाँका त लोकेर फुल्बे थँका–थँका,
झिप्सा परा हबे रिति–संस्कार।
के दिबे बुर्हाक टहलटुक्रा करिए,
नि–बुद्धिया हए हबे गो लाचार।।

कुन्हा अन्छाबे ऊला जिहापुतालाक?
काँहे सुनाबे बिदेशतक् मनेर पुकार?
दुबिधात् छे पुर्खार धरम–संस्कृतिला,
के साम्हलाबे यिला घर–दुआर।।

✍ जोगेन्द्र प्रसाद राजवंशी
कचनकवल–३, दल्की झापा
हाल : मलेसिया

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